लेखक:- जसा राम ( गंगासरा) की कलम से…
शिक्षा का अर्थ:-
शिक्षा का वास्तविक अर्थ होता है ऐसा ज्ञान या ऐसे संस्कार जो न केवल एक सुदृढ़ भविष्य बनाने के लिए आवश्यक होता है बल्कि यह एक सुदृढ़ राष्ट्र के निर्माण हेतु भी बहुत महत्वपूर्ण है। लेकिन आज के समय में शिक्षा का मतलब केवल इतना रह गया है कि शिक्षा से केवल नौकरी प्राप्त की जा सकती है। यह अर्थ केवल उन लोगों के द्वारा ही नहीं निकाला जा रहा है जो कभी विद्यालय गए ही नहीं आज के समय का हर व्यक्ति यहीं अर्थ निकलता है।
शिक्षा का प्रभाव:-
हम सब जानते हैं कि जब तक भारत अंग्रेजी हुकूमत का गुलाम था तब तक किसी भी भारतीय नागरिक को पढ़ने का हक नहीं दिया गया था। भारतीय लोगों में शिक्षा का अभाव होने के कारण भारतीय विद्रोह करने से भी डरते थे। कुछ समाज सुधारकों ने भारतीय जनता को जागरूक किया तथा शिक्षा का महत्व समझाया। इस शिक्षा से ही भारतीय जनता में जागरूकता आई तथा इन्हें आभास हुआ कि गुलाम बनकर जीना मरने के समान हैं। अगर उस समय इस शिक्षा का प्रसार नहीं हुआ होता तो आज तक हम अंग्रेज़ो के गुलाम रहते।

शिक्षा का एक सुदृढ़ राष्ट्र निर्माण में योगदान:-
शिक्षा एक ऐसा हथियार है जिसके जरिए हम कुछ भी हासिल कर सकते हैं। इसके द्वारा ही एक राष्ट्र का संचालन सुदृढ़ एवं प्रभावपूर्ण तरीके से किया जा सकता है। जिस राष्ट्र का प्रत्येक नागरिक शिक्षित एवं जागरूक होगा वहीं राष्ट्र अपना विकास सुनिश्चित कर सकता है। आज के बच्चों को ही भावी राष्ट्र का सर्जक माना जाता है लेकिन अगर आज की शिक्षा की जो स्थिति है इस तौर से तो हमारे देश का भविष्य संकट में है। अगर यहीं स्थिति रही तो एक समय ऐसा आएगा जब हमारा देश विकसित तो दूर की बात है सबसे गरीब देशों में गिना जा सकता है।
भारत की शिक्षा व्यवस्था की कमियां:-
आज शिक्षा को एक व्यवसाय बना दिया गया है। आज एक ऐसा समय चल रहा है जिसमें सभी अभिभावक अपने-अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों से निकालकर निजी स्कूलों में पढ़ाने की इच्छा रखते हैं। सरकारी स्कूलों की पढ़ाई की तुलना किसी से नहीं की जा सकती, क्योंकि यहां ऐसे अध्यापक होते है जो अपनी मेहनत से यहां आए है। कमियां :- प्रथम:- वर्तमान समय में अपनी प्रगति को लेकर चिंतित अध्यापक जो एक बार नौकरी लगने के बाद उच्च पद प्राप्त करना चाहते हैं इस निमित्त वे अपनी तैयारी करने के लिए ज़्यादा छुट्टी में रहने से बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है। दूसरी:- बच्चों की पढ़ाई के प्रति उदासीनता, बच्चे पढ़ाई के दौरान परिणाम में अपने सहपाठियों से पिछड़ जाते हैं तब वे सोचते हैं कि वे पढ़ाई नहीं कर सकते। या वे सोचते है कि उनका उस टोपर बच्चे के जितना दिमाग नहीं है। तीसरा:- सरकारी स्कूलों के प्रति प्रशासन का बहुत कम ध्यान देना तथा ग्रामीण इलाकों के बच्चों में पढ़ाई के प्रति जागरूकता का अभाव भी इसका प्रमुख कारण है। तथा अभिभावकों का भी अपने बच्चों की पढ़ाई पर ध्यान न दिया जाता है। चौथा:- सरकार शिक्षा के क्षेत्र में नई-नई योजनाएं तो बनाती है पर उनको अच्छे से क्रियान्वित नहीं करती हैं।

शिक्षा व्यवस्था में सुधार कैसे हो…
शिक्षा व्यवस्था में सुधार हेतु केवल सरकार की योजनाएं ही उपयुक्त होंगी यह जरूरी नहीं है क्योंकि जब तक बच्चों में पढ़ाई के प्रति जिज्ञासा तथा अध्यापको में पढ़ाने के प्रति जिज्ञासा उत्पन्न नहीं होगी तब तक शिक्षा व्यवस्था में सुधार नहीं हो पाएगा। इस व्यवस्था में बदलाव हेतु हमें चाहिए कि सभी अभिभावक अपने बच्चों के भविष्य को सुनहरा बनाने के लिए उनकी पढ़ाई पर ध्यान देवें तथा समय-समय पर विद्यालय से संपर्क कर अपने बच्चों की गुरूजनों से उसकी प्रगति रिपोर्ट प्राप्त करें। इससे न केवल बच्चा पढ़ाई के प्रति लगेगा साथ ही साथ अध्यापक भी सोचेंगे कि अगर हमारे पढ़ाने में किसी प्रकार की कमी रही तो अभिभावकों को हम क्या जवाब देंगे।
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