नई दिल्ली | सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म जैसे फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब आदि पर रील्स बनाने का चलन तेजी से बढ़ रहा है। खासकर शादीशुदा महिलाएं और युवतियां भी इस डिजिटल दौर में अपनी क्रिएटिविटी दिखाने के लिए रील्स बना रही हैं। लेकिन, समाज के कुछ तबकों में इसे पारिवारिक मान-सम्मान से जोड़कर देखा जा रहा है, जिससे यह विषय बहस का मुद्दा बन गया है।
समाज में उठती चिंताएं कई परंपरागत और रूढ़िवादी सोच रखने वाले सामाजिक संगठनों और बुजुर्गों का मानना है कि प्रतिष्ठित घरों की महिलाएं और बेटियां जब सोशल मीडिया पर अपनी फोटो-वीडियो बनाकर साझा करती हैं, नृत्य करती हैं या फैशन ट्रेंड्स को फॉलो करती हैं, तो यह परिवार की प्रतिष्ठा के खिलाफ जाता है। उनका मानना है कि इससे भारतीय संस्कृति, मर्यादा और पारिवारिक गरिमा पर असर पड़ता है। कुछ सामाजिक समूहों ने समाज प्रमुखों से अपील की है कि वे ऐसे परिवारों को आगाह करें, जिनकी महिलाएं और युवतियां इस प्रकार की गतिविधियों में शामिल हैं। साथ ही, चेतावनी दी गई है कि अगर वे नहीं मानते, तो ऐसे परिवारों का सामाजिक बहिष्कार (बायकॉट) करने पर भी विचार किया जा सकता है।
रील्स के समर्थन में तर्क वहीं, दूसरी ओर कुछ विशेषज्ञों और आधुनिक विचारधारा वाले लोगों का कहना है कि रील्स बनाना किसी की व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हिस्सा है। उनका मानना है कि अगर कोई महिला या युवती शालीनता के साथ अपना टैलेंट सोशल मीडिया पर दिखाती है, तो इसमें कुछ भी गलत नहीं है। कुछ मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, सोशल मीडिया आज के युग का एक अभिन्न हिस्सा बन चुका है और महिलाएं अपनी रचनात्मकता, नृत्य, कला, और अभिनय को प्रदर्शित करने के लिए इसका उपयोग कर रही हैं। इसे केवल नकारात्मक नजरिए से देखना उचित नहीं है।
क्या होना चाहिए समाधान?
1. संवाद जरूरी: परिवारों और समाज को चाहिए कि वे अपनी बेटियों और महिलाओं से संवाद करें और उनके दृष्टिकोण को समझें।
2. संस्कारों पर जोर: यदि परिवार को लगता है कि रील्स बनाने से प्रतिष्ठा प्रभावित हो रही है, तो वे अपनी बेटियों को सही दिशा दिखाएं, बजाय जबरदस्ती रोकने के।
3. सोशल मीडिया जागरूकता: महिलाओं को यह भी समझना चाहिए कि वे किस प्रकार की सामग्री पोस्ट कर रही हैं और उसका उनके जीवन व समाज पर क्या प्रभाव पड़ सकता है।
4. सामाजिक बहिष्कार का विरोध: किसी भी परिवार या व्यक्ति का बहिष्कार करना लोकतांत्रिक मूल्यों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के खिलाफ है। यह एक सामंजस्यपूर्ण समाज के निर्माण में बाधा उत्पन्न कर सकता है। सोशल मीडिया का सही और मर्यादित उपयोग किया जाए तो यह सशक्तिकरण और आत्मनिर्भरता का जरिया बन सकता है। रील्स बनाने की प्रवृत्ति को रोकने के बजाय, इसे सकारात्मक दिशा में मोड़ने की जरूरत है। समाज को चाहिए कि वह नैतिक शिक्षा और जागरूकता के माध्यम से इस विषय पर संतुलित दृष्टिकोण अपनाए।
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