Ranga Billa: कहानी रंगा-बिल्ला की.. दिल्ली का पहला ‘निर्भया कांड’, फांसी के 2 घंटे बाद भी चलती रही थीं दरिंदे की सांसें

Ranga Billa Black Warrant: आज नेटफ्लिक्स की वेब सीरीज ‘ब्लैक वारंट’ रंगा-बिल्ला के कांड को फिर से जीवंत कर रही है. यह सीरीज जेलर सुनील गुप्ता की किताब पर आधारित है और दर्शकों को उस समय के भयावह सत्य से रूबरू कराती है.

Ranga Billa Black Warrant: 1978 की एक बरसाती शाम.. दिल्ली के धौला कुआं स्थित ऑफिसर्स एन्क्लेव में चोपड़ा परिवार के दो मासूम बच्चे गीता और संजय घर से निकले. गीता जीसस एंड मैरी कॉलेज में सेकंड ईयर की छात्रा थी और उसका छोटा भाई संजय संसद मार्ग स्थित ऑल इंडिया रेडियो (एआईआर) के ‘युववाणी’ कार्यक्रम में हिस्सा लेने जा रहे थे. लेकिन उन्हें नहीं पता था कि यह उनकी आखिरी यात्रा होगी. उनका अपहरण हुआ.. लड़की के साथ गैंगरेप हुआ. दोनों को दर्दनाक मौत दे दी गई. आज नेटफ्लिक्स की वेब सीरीज ‘ब्लैक वारंट’ इस कांड को फिर से जीवंत कर रही है. यह सीरीज जेलर सुनील गुप्ता की किताब पर आधारित है और दर्शकों को उस समय के भयावह सत्य से रूबरू कराती है.

अपहरण की भयावह घटना

बारिश के कारण चोपड़ा भाई-बहन संसद मार्ग तक पैदल नहीं जा सके. उनके परिवार के दोस्त डॉ. एमएस नंदा ने उन्हें गोले डाक खाना के पास छोड़ा. वहीं, एक पीली फिएट कार में बैठे दो अपराधी रंगा और बिल्ला ने उन्हें अगवा कर लिया. इलाके के कुछ लोगों ने इस घटना को देखा. किसी ने कार की नंबर प्लेट ‘MRK 930’ नोट की तो किसी ने गीता को मदद के लिए चिल्लाते हुए सुना. लेकिन पुलिस इस सूचना पर समय रहते कार्रवाई नहीं कर सकी.

दो मासूम जिंदगियों का अंत

अगले तीन दिन तक गीता और संजय का कोई पता नहीं चला. 28 अगस्त 1978 को रिज के घने जंगलों में उनके शव बरामद हुए. गीता के साथ बलात्कार हुआ था और दोनों की बेरहमी से हत्या कर दी गई थी. यह खबर सुनते ही पूरा देश सदमे में आ गया.

दिल्ली का पहला ‘निर्भया कांड’

1970 के दशक में दिल्ली अभी ‘रेप कैपिटल’ के नाम से नहीं जानी जाती थी. लेकिन इस जघन्य अपराध ने पूरे समाज को हिला कर रख दिया. गीता और संजय की हत्या ने देशभर में गुस्से और आक्रोश की लहर पैदा कर दी. घटना के दो हफ्ते बाद रंगा और बिल्ला को कालका मेल में सफर करते हुए गिरफ्तार किया गया. उन्होंने गलती से एक आर्मी डिब्बे में चढ़कर अपनी पहचान उजागर कर दी. लांस नायक गुरतेज सिंह और एवी शेट्टी ने उन्हें पकड़कर पुलिस के हवाले कर दिया. उनके सामान से खून से सने कपड़े और हथियार बरामद हुए.

तिहाड़ जेल में अंतिम दिन

गिरफ्तारी के बाद रंगा और बिल्ला को तिहाड़ जेल भेजा गया. जेलर सुनील गुप्ता ने अपनी किताब ‘ब्लैक वारंट: कन्फेशन्स ऑफ ए तिहाड़ जेलर’ में उनके व्यवहार का जिक्र किया. रंगा दिखावे के लिए खुश रहता था जबकि बिल्ला हमेशा तनाव में रहता था. यह मामला न केवल जनता के आक्रोश का कारण बना बल्कि राजनीतिक गलियारों में भी हलचल मचा दी. तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई को भी इस मामले में हस्तक्षेप करना पड़ा. यह मामला जनता पार्टी सरकार के पतन के कारणों में से एक बन गया.

रंगा की फांसी से पहले की घड़ियां

दिल्ली हाईकोर्ट ने रंगा और बिल्ला को मौत की सजा सुनाई. सुप्रीम कोर्ट ने इस सजा को बरकरार रखा. 31 जनवरी 1982 को उन्हें तिहाड़ जेल में फांसी दी गई. फांसी के दिन रंगा और बिल्ला को सुबह-सुबह उनके सेल से बाहर निकाला गया. रंगा ने फांसी के दो घंटे पहले तक खुद को बेपरवाह दिखाने की कोशिश की लेकिन जैसे-जैसे समय नजदीक आता गया.. उसकी घबराहट बढ़ती गई. फांसी के ठीक पहले उसने बिल्ला से कहा कि तुम्हारी वजह से आज मैं यहां हूं. बिल्ला ने इसका कोई जवाब नहीं दिया.

रंगा की सांसें और फांसी के बाद का घटनाक्रम

31 जनवरी 1982 को जब रंगा और बिल्ला को फांसी दी गई तो रंगा की सांसें फांसी के बाद भी करीब दो घंटे तक चलती रहीं. यह तिहाड़ जेल के इतिहास की एक दुर्लभ घटना थी. जिसने जेल प्रशासन को भी स्तब्ध कर दिया. डॉक्टरों ने पुष्टि की कि उसकी मौत धीरे-धीरे हुई. जो शायद उसके शरीर की अनोखी प्रतिक्रिया थी. कुछ रिपोर्ट्स में यह भी दावा किया गया है कि फांसी के वक्त रंगा ने सांस रोक ली थी जिसके कारण फांसी के बाद उसकी धड़कन चल रही थी.


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